EARTH IS BEAUTIFUL

EARTH IS VERY BEAUTIFUL


Save the air, save the water, save the animals, save the plants.

These are necessary to save human being.

Save the art, save the culture, save the language.

These are necessary to the rise of human being.

Friday, April 5, 2013

दिलों में प्यार जगाओ तो कोई बात बने




अज़ाबे  दौर मिटाओ तो कोई बात बने 
दिलों में प्यार जगाओ तो कोई बात बने 
तुम्हारा चाँद सा चहरा सुकून देता है 
नक़ाब रुख से उठाओ तो कोई बात बने 
उदास रात है तन्हाई है अन्धेरा है 
चरागे फ़िक्र जलाओ तो कोई बात बने 
करार दिल को जो दे रूह को सुकूँ बख्शे 
गज़ल इक ऐसी सुनाओ तो कोई बात बने 
सुनाने आये हैं सब हाले दिल अनिल तुमको 
दुखों को अपने छुपाओ तो कोई बात बने

Saturday, September 17, 2011

भागती, दौड़ती, हाँफती ज़िन्दगी



फ़ासले रोज़ है पाटती ज़िन्दगी
भागती, दौड़ती, हाँफती ज़िन्दगी
पाप धोती है ये, मैल धोती है ये 
है ये गंगा कभी ताप्ती ज़िन्दगी
धूपबत्ती के जैसी महकती हुई
है इबादत कभी आरती ज़िन्दगी
है कभी फूल सी मुस्कुराती हुई
है कभी ख़ार सी सालती ज़िन्दगी
जूझती है थपेड़ों से, दहशत के भी 
थरथराती हुई कांपती ज़िन्दगी
बोझ धरती नहीं जिनका सह पाती है
किसलिए उनको है पालती ज़िन्दगी
मौत इक बार ही मारती है मगर
बारहा रोज़ है मारती ज़िन्दगी
ज़लज़ला हो कि तूफ़ान, सैलाब हो
है नहीं हार 'अनिल' मानती ज़िन्दगी

Friday, September 16, 2011

दुनिया बड़ी अजीब है

देखी नहीं तो आज मेरे साथ चल के देख
दुनिया बड़ी अजीब है, घर से निकल के देख
निकला है तू बदलने को, दुनिया का रंगो रूप
खुद अपने आप को तो ज़रा सा बदल के देख
इक बार देख अपने गरेबां में झाँक कर
औरों की ख़ामियों को न इतना उछल के देख
तुझ पर भी जाँ लुटाने को परवाने आयेंगे
तू भी तो बनके  शमअ ऐ फ़रोज़ाँ, पिघल के देख
शिकवा न कर ज़माने की रफ़्तार का 'अनिल'
सांचे  में इस ज़माने के तू भी तो ढल के देख 

Sunday, August 7, 2011

खामोशी से देखता, सब नीला आकाश



डा. अनिल कुमार जैन 
माँ जाड़े की धूप है, माँ पीपल की छाँव /
लेती है जब गोद में, माँ बन जाती पाँव //
श्रीफल जैसे हैं पिता, माँ जैसे नवनीत /
गद्य पाठ लगते पिता, माँ लगती है गीत //
अपनी-अपनी रोटियाँ, सेंक रहे हैं लोग /
खुदगर्जी अब हो गई, जैसे छुतहा रोग //
जैसे- तैसे दिन कटा, कैसे काटें रात /
भूखी आँतें कर रहीं, नंगे तन से बात //
तेरी कथनी व्यर्थ की, मेरी बातें गूढ़ /
मैं बोलूँ तू सुन मुझे, मैं ज्ञानी तू मूढ़ //
मैं हीरा तू कांच है, ऊंचे बोलें बोल /      
अपने-अपने नाम के, पीट रहे सब ढोल //
लगता है अब हाथ से, निकल गई है बात
दरबारों में चल रहे, जूता, थप्पड़, लात //  
रहा चमकता उम्र भर, श्रम सीकर से भाल /
वृद्धावस्था हो गई, अब जी का जंजाल //
ढलता सूरज कह रहा, फिर आयेगी भोर /
समय इशारा  कर रहा, परिवर्तन की ओर //
कौन फंस गया जाल में, किसने फेंका पास /
खामोशी से देखता,  सब नीला आकाश //
('शब्द प्रवाह' अप्रेल-जून २०११ में प्रकाशित)
   
      

Sunday, May 15, 2011

फ़लक से आग बरसती है जल रहा है दिन

फ़लक से  आग  बरसती है  जल रहा  है दिन 
पसीना  बन के  बदन  पर पिघल रहा है दिन
 पिघलती  सड़कों पे  छाया हुआ  है सन्नाटा 
दहकती  आग  में  जैसे की  गल रहा है दिन 
बदन हैं  भीगे हुए ,  ख़ुश्क होंठ,  ख़ुश्क गले 
हर एक शख्स को,गर्मी का खल रहा है दिन 
सुकून  रात को मिल पायेगा, ये मुश्किल है 
लपट  बना के  हवाओं को  ढल रहा  है दिन
मगर मज़े हैं 'अनिल' गर्मियों के भी अपने 
लिए वो हाथ में शरबत,  मचल रहा है दिन  

Thursday, May 5, 2011

बिना उफ़ किये किस तरह रह रहे हो


समुन्दर  की  तुम  तो   सदा  तह  रहे   हो 
क्यूँ   दरिया  में  जज़्बात  के  बह  रहे  हो 
इरादे     थे     फौलाद      जैसे        तुम्हारे 
क्यूँ   बालू   की   दीवार    से  ढह  रहे   हो 
तुम्हीं    ने   बिगाड़ी   है   आदत    हमारी 
सुधरने   की   हम  से  तुम्हीं  कह  रहे हो 
हक़ीक़त  को   पहचानो  तुम  ज़िंदगी की 
यूँ  ख्वाबों  की  दुनिया  में  क्यूँ रह रहे हो 
अँधेरे   नगर    की     अंधेरी    गली    में 
बिना  उफ़  किये  किस  तरह  रह रहे हो 
ज़रूरी    है   जीना   ख़ुदी   बेचकर   क्या 
सितम सर झुका कर 'अनिल' सह रहे हो 
(परिधि 2011) 

मैं समझता हूँ तेरी मजबूरी

कीजिये   बात   दिल   लुभाने    की 
प्यार   के   गीत    गुनगुनाने     की 
चन्द    लम्हे   मिले   हैं  जी  लें हम 
छेड़   कुछ   बात    मुस्कुराने    की 
मैं    समझता   हूँ    तेरी    मजबूरी 
कुछ    ज़रुरत    नहीं    बहाने   की 
इश्क़  किस  कश्मकश  में लाया है 
हम  सुने  दिल  की  या ज़माने की 
जाँ  बदन  से   निकल   गई   जैसे 
बात  निकली  जो  उसके जाने की 
दिल है शीशे का तू न कर कोशिश 
प्यार  में  दिल  को आजमाने की 
ज़िक्रे उल्फ़त 'अनिल' ने छेड़ा तो 
बात   की  उसने   आबो  दाने  की 
(परिधि 2011) 

Thursday, April 28, 2011

इस सड़क से रोज़ इक दुनिया गुज़रती है




ज़ह्न  से  होकर   जब  इक  आँधी  गुज़रती है  
तब ग़ज़ल  या  नज़्म  कागज़ पर उतरती है 
बैठे-बैठे    सब     नज़ारा      देख    लेता    हूँ   
इस  सड़क  से  रोज़,  इक दुनिया गुज़रती है 
हर   घड़ी   यूं   टोकना   अच्छा   नहीं   होता 
इस  तरह  से  भी  कभी  आदत  सुधरती  है 
हाथ  रख  कर  हाथ   पर  बैठे  हुए  हो  क्यूं? 
कामचोरी   से  कभी  किस्मत   संवारती   है 
अस्ल   सोने    की   यही   तासीर    देखी   है 
आँच  पाकर   और  भी   सूरत  निखरती  है 
खुद ब खुद फ़न की ख़बर हो जाती है सबको  
जिस  तरह  से  फूल की  खुशबू बिखरती है 
हम भी होंगे एक, उनमें से 'अनिल' जिनको 
बाद  मर  जाने  के  दुनिया  याद  करती  है 
(नई ग़ज़ल में प्रकाशित )

Sunday, April 24, 2011

ये कैसा बचपन



पढ़ना-लिखना, खेलना, क्या जाने नादान||
गलियों -गलियों ढूँढता, जीने का सामान|| 

Sunday, March 20, 2011

My Photos




                                                                   God is watching  

                                                                       Life Partner 

                                                                     Jama Masjid Saugor


   

                                                    
                  





















         




                                                                          

Wednesday, March 9, 2011

आसमान भर धूप



धागा  लेकर  भाव   का,  गूंथे  शब्द   विचार .
गांठ   कल्पना  की  लगा , बना लिया है हार .
पेट  पीठ  से  लग गया ,  आँखों  में  हैं  प्रान
ऐसे  में  कैसे  रहे ,  पाप- पुन्य  का    ध्यान.
किसने मुझको क्या दिया,सबका रखूँ हिसाब.
मैंने किसको क्या दिया , इस का नहीं जवाब .
मर्यादा  को  तोड़  कर ,  जब  कर डाली भूल.
माथे  पर  चढने  लगी,   तब   पैरों  की  धूल.
मैली  चादर  ओढ़  कर ,  सर  पर  बांधी पाग .
बैठे बैठे  गिन   रहे ,   इक   दूजे   के   दाग .
ज्यों  का  त्यों  कैसे  रखे ,  कोई  अपना रूप .
मुठ्ठी  भर  छाया यहाँ ,  आसमान  भर धूप.
भरे  हुए  खलिहान में ,  लगी  हुयी  है  आग .
उसे  बुझाने  की  जगह ,  लोग  रहे  हैं  भाग .
बोली  अपनी  भूल कर ,  सभी  हो  गए मूक .
चला  शिकारी  हाथ  में ,  लेकर  जब बन्दूक .
सम्बन्धों  पर  जब  चढा , खुदगर्जी  का  रंग .
 पौधा  सूखा  प्रेम  का ,   मुरझाये   सब अंग .
खुशिओं  का  बाज़ार  है ,  पर  ऊंचे  हैं   दाम .
भाव  ताव  में हो गयी , इस जीवन की शाम
हम  से  तो  बच्चे  भले ,  हैं  आँखों  के   नूर .
छुपते  माँ   की गोद में ,  दुःख  हो  जाते  दूर .
कुदरत  ने  क्या  खूब  दी  , बच्चों को सौगात .
फूलों  सा  चहरा  दिया ,  दी   फूलों  सी  बात. 
अनिल कुमार जैन